Capability Maturity Model in Hindi

CMM का पूरा नाम capability maturity model है. यह एक ऐसा मॉडल है जिसका प्रयोग organisation(संगठन) के सॉफ्टवेर को विकसित तथा पहले से विकसित सॉफ्टवेर को improve(सुधारने) के लिए किया जाता है. इस model को सन् 1986 में SEI(software engineering institute) ने विकसित किया था.

बहुत से organisations में सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट बहुत ही ज्यादा late हो जाते है और इनका बजट(budget) भी ज्यादा हो जाता है जिसके कारण प्रोजेक्ट undiscipilined(अनुशासनहीन) तथा अव्यस्थित हो जाता है. इस परेशानी को हल करने के लिए SEI को CMM का निर्माण करना पड़ा था.

capability maturity model(CMM) जो है वह software organisation को मार्गदर्शित करती है कि software को विकसित तथा maintain करने में जो processes इस्तेमाल में लायी जाती है उस पर नियन्त्रण कैसे किया जाएँ.

CMM सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट के मूल्याकन से प्राप्त knowledge तथा government एवम् industry से प्राप्त फीडबैक पर आधारित होता है. इसमें auditors के द्वारा organisations को उसकी क्षमता के अनुसार CMM रेटिंग दी जाती है.

आजकल इसको CMMI(capability maturity model intergation) कहा जाता है.

5 Levels of Software Process Maturity

1:-initial level:-यह cmm का पहला level है. यह लेवल बहुत ही unpredictable तथा बुरी तरह से controlled(नियंत्रित) होता है. इस level में सॉफ्टवेर को विकसित करने के लिए परिस्थितियां stable(स्थिर) नही होती है क्यूंकि organisation का कोई standard नही होता है.

कोई भी सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट तभी सफल हो सकता है जब manager तथा programmer अच्छी तरह काम करें और सफलता तब तक बनी रहेगी जब तक कि वह अगले प्रोजेक्ट में भी एक साथ काम करें. लेकिन इन दोनों में से कोई भी organisation को छोड़ देता है तो प्रोजेक्ट की क्वालिटी में गिरावट आ जाती है. प्रोजेक्ट कि क्वालिटी में गिरावट का एक प्रमुख कारण सही तरीके से टेस्टिंग नही करना भी है.

2:-Reapeatable level:- यह cmm का दूसरा लेवल है. इसमें सॉफ्टवेर डेवलपमेंट कि सफलता के लिए process को दोहराया(reapeat) जाता है जो कि consistent परिणाम देते है.

इसमें प्रोजेक्ट की लगातार सफलता के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.

इसमें नये प्रोजेक्ट की मैनेजमेंट तथा प्लानिंग समान प्रकार के प्रोजेक्ट्स के experience के आधार पर की जाती है.

3:-Defined level:- यह cmm का तीसरा level है. इसमें organisation के सॉफ्टवेर को विकसित तथा maintain करने में प्रयुक्त standard processes को documented तथा established(स्थापित) किया जाता है.

इन standard processes को वक्त के साथ बेहतर बनाया जाता है जिससे कि सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट की performance हमेशा consistence रहती है.

processes के established होने से प्रोग्रामर, manager तथा अन्य technical staff अच्छी तरीके से कार्य कर सकते है तथा सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट कि cost, schedule एवम functions को आसानी से नियंत्रित भी कर सकते है.

4:-Managed level:- यह CMM का चौथा लेवल है. इसमें organisation सॉफ्टवेर प्रोडक्ट तथा processes दोनों के लिए लक्ष्य निर्धारित करती है. इसमें प्रोजेक्ट कि क्वालिटी उच्च कोटि की होती है तथा performance हमेशा consistent तथा predictable होती है.

इसमें सॉफ्टवेर डेवलपमेंट के लिए sub-process को select(चुना) किया जाता है जिनका कि पूरी processes की परफॉरमेंस में पूरा सहयोग रहता है.

चुने गये sub-process को statistical तथा अन्य quantitative(मात्रात्मक) तकनीकों के द्वारा नियंत्रित किया जाता है.

5:-Optimizing level:- यह cmm का अंतिम यानि कि पाचवां लेवल है तथा इसमें process की improvment पर ध्यान दिया जाता है. process को बेहतर बनाने के लिए सम्भावित errors तथा गलतियों को कम करता है तथा सॉफ्टवेर के विकसित होने में लगने वाली cost को भी कम करता है.

Advantage Of CMM:-

1:-इसका एक लाभ यह है कि programmer, manager तथा technical staff के लोग हमेशा क्वालिटी को प्राथमिकता देते है.

2:-इसमें cost बहुत ही कम लगती है क्योंकि सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट में defects तथा errors बहुत ही कम होती है.

3:-इससे सॉफ्टवेर प्रोडक्ट की productivity बढती है.

4:-ज्यादातर customer(ग्राहकों) को लाभ होता है जिससे वह satisfy होते है.

5:-इसके द्वारा सॉफ्टवेर प्रोजेक्ट कि predictibility तथा consistency बढती है.

6:-इसके द्वारा सॉफ्टवेर process में सुधार होता है.

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